एक दिन मै अपने कमरे में बैठा था की तभी लाइट चली गई , मैने उजेले के लिए मोमबत्ती जलाया और न जाने क्यों उसकी हिलती-डुलती ज्योति पर मेरी नजर चली गई फिर उसके बाद जो विचार मेरे दिल में आये और अंतर्मन से जो हमारा वाद-प्रतिवाद हुआ वह आप के सामने है ......और यह तब से मेरी सबसे ज्यादा मोटीवेसनल कविता बन गई आप भी पढ़े और बताये यह आप को कैसी लगी ?
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(दीपक का सार)
कहो दीप से सम ज्योति जलाये ,
यू लप-दप कर न अभिमान दिखाए ,
(अब अंतर्मन मुझे जवाब दे रहा है )
क्यों करते हो तुम प्रश्न ज्योति से ,
एक बार तो तुम पूछो खुद से .
है तुम में भी दीपक का सार ,
खुद में झाको मत करो विचार.
ये जीवन दीपक जैसा है ,
कभी संभालता ,बुझने को डरता ,
लड़ता हवा के झोको से ,
सोच उजेला सब पाए,
खुद नीच अँधेरा कर लेता.
यदि ! है विचार लप-दप करने का ,
तो ये ही है उसका अभिमान .
यदि रहे वो जलता अपलक तो ,
हीरे जैशा हो जाएगा .
और सिमट कर छुद्र उंगलियों ,
की अंगूठी में बंध जाएगा .
क्या हुआ दीप बुझ जाते है ,
बड़े हवा के झोको से .
पर तूम खुद को होलिका बनाओ ,
फिर आंधी भी चल जाये .
तो बुझने का गम नहीं सताता ,
क्योकि आने वाला फिर हर झोका ,
और आग को है भडकता .
बढे ताप कितना भी ज्यादा ,
पर नियंत्रण इतना रखना .
कंही दूसरा न जल जाये ,
इतना विचार तुम करके रखना .
इस जीवन में आ करके तुम ,
कस्टो से बस मत घबराना .
सार समझ के दीपक का ,
बस दीपक जैसे बन जाना !.
(लेखक - अदभुत अद्वैत)
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